भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं होती; वह विचारों, संस्कृति और सभ्यता की आत्मा होती है। किसी भी समाज की बौद्धिक विरासत उसके शब्दों में सुरक्षित रहती है। संस्कृत, जो भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा की आधारभूत भाषा रही है, अपने भीतर असंख्य ऐसे दार्शनिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक अवधारणाएँ समेटे हुए है जिनका अर्थ केवल शब्दों से नहीं, बल्कि संदर्भ, परंपरा और अनुभव से जुड़ा हुआ है। जब इन अवधारणाओं का अनुवाद किसी दूसरी भाषा में किया जाता है, तो वह केवल भाषाई प्रक्रिया नहीं रह जाती, बल्कि वह विचारों की दिशा को प्रभावित करने वाली एक शक्तिशाली प्रक्रिया बन जाती है।
इसी संदर्भ में यह पुस्तक "शब्द, सत्ता और सत्य" एक रोचक और चिंतनशील कथा के माध्यम से उस जटिल संसार को उजागर करने का प्रयास करती है जहाँ भाषा, ज्ञान और सत्ता आपस में टकराते हैं। इतिहास में कई बार ऐसा हुआ है जब संस्कृत के गहन और बहुस्तरीय शब्दों का अनुवाद ऐसे रूप में प्रस्तुत किया गया जिसने उनके मूल अर्थ को सीमित या परिवर्तित कर दिया। कुछ अनुवाद परिस्थितियों की मजबूरी में हुए, कुछ अनजाने में, और कुछ ऐसे भी थे जिनके पीछे स्पष्ट राजनीतिक या वैचारिक उद्देश्य छिपे हुए थे। यही वह बिंदु है जहाँ अनुवाद केवल विद्वता का कार्य नहीं रहता, बल्कि वह सत्ता और विचारधारा के प्रभाव में आने लगता है।
यह कथा इसी प्रश्न से शुरू होती है-क्या किसी प्राचीन शब्द का सटीक अनुवाद वास्तव में संभव है? और यदि संभव है, तो उसे तय करने का अधिकार किसके पास है? विद्वानों के पास, संस्थानों के पास, या उन शक्तियों के पास जो समाज की विचारधारा को दिशा देना चाहती हैं? संस्कृत के कई शब्द-जैसे धर्म, कर्म, योग, आत्मा, मोक्ष-सदियों से बहस और व्याख्या का विषय रहे हैं। इन शब्दों के अर्थ केवल शब्दकोश में नहीं मि