पंकज चित्र लिखते हैं और कविता आंकते हैं। यह उनका प्रथम कविता संकलन है किन्तु मेरी स्मृति से यह उनका कविता में लौटना है। उनकी रचनाओं में लौटना झांकता है। शब्दों के पीछे से, आकारों के पीछे से, मेहर बाबा के आशीर्वाद के पीछे से। वे गलियों में लौटते हैं, घर लौटते हैं। उन्हें लौटना पसंद है। तभी वे कविता में लिखते हैं, मैं फिर से लौट के आऊंगा। मुझे लगता है वे प्रेम के मौन में लौटेंगे तो बार बार लौटना नहीं होगा। रह जाना होगा कविता में। यही विषय है उनके कविता संकलन का। प्रेम शुभेच्छा। - गौतम चटर्जी (वरिष्ठ कवि, ऋषि)
हर वक़्त की मुश्किलें अलग होती हैं। इस वक़्त की क्या हैं? इस वक़्त की मुश्किल है शोर, सूचनाओं का घटाटोप, और स्मृति पर बेआवाज़ हमला। कविता इन मुश्किलों से कैसे निपटेगी? अनेक बार कविता इन मुश्किलों से सिर्फ़ दर्ज करने से भी निपटती है। पंकज इन कविताओं को लिखकर अपनी आंतरिक भावनाओं की अभिव्यक्ति मात्र नहीं करते बल्कि वे अपने वक़्त की मुश्किलों के बर-अक्स इन कविताओं को मोर्चे पर तैनात करते हैं - विस्मृति के विरूद्ध और यथास्थिति के विरुद्ध। वे मौन को शोर के विरुद्ध एक कारगर प्रतिरोध के तौर पर तैनात करते हैं। यह कविताएँ उन लोगों को लड़ने के लिए आवाज़ देती हैं जिन्हें हाशिये से भी बाहर किये जाने की पूरी कोशिशें चल रही हैं। लेकिन फिर भी अगर वे कामयाब नहीं हो पा रही हैं तो इसके लिए इंसान की जिजीविषा का ही सलाम किया जाना चाहिए। यह कविताएँ इंसान के हौसले को पेश वही सलाम हैं। - विनीत तिवारी (वरिष्ठ कवि, रंगकर्मी)