About the Book: 1800 के आसपास का समय वह कालखण्ड था जब राजपूताना की रियासतें अपनी सीमाओं और अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही थी। व्यापार के साधन आधुनिक नहीं थे, लेकिन जीवटता अपार थी। मारवाड़ और जयपुर रियासतों के बीच सांभर झील से निकलने वाला नमक सिर्फ एक वस्तु नहीं, बल्कि एक सफ़ेद सोने के रूप में आर्थिक सम्बल प्रदान करने वाली सांस्कृतिक मुद्रा था। जब राजस्थान की तपती रेत पर ऊंटों के साथ-साथ बैलों की टोलियां भी चलती थीं, वह समय आज के दौर से कहीं अधिक धीमा लेकिन रोमांच से भरा था।
सांभर से लूणी और फिर पचपदरा तक का रास्ता आज के नक्शे पर शायद छोटा लगे, लेकिन उस वक़्त यह एक अग्निपरीक्षा के समान था। यह पुस्तक एक यात्रा वृत्तांत नहीं, बल्कि एक मनुष्य के साहस और उसके गुप्त अस्तित्व की खोज है। व्यापारिक रास्तों को देखेंगे, बल्कि उस समय के लोकगीतों, खान-पान और बंजारों की अद्भुत संस्कृति को भी करीब से महसूस करेंगे। आप और भी कई ऐतिहासिक बातें जानेंगे और इस उपन्यास के नायक गोरा और उसके बेटों के साथ ऐसी जगह देखेंगे कि आप कहानी और दृश्यों में खो जाएँगे।